" रब शायरी "
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God
पत्ता भी हिलता है तो , उसी के हुकम से
अधिकार है हमारा ,खुद ही के कर्म से
मिलता है फल तेरे ही कर्म की नियत से -
आदमी जीता अपने - २ विकारों से
.......
घटनाएं घटती है , हुकमें मंजूरे खुदा से
चाँद - तारे भी तू ही उगा रहा है
रोशन है ये जहां हमारा होता सब कुछ तेरे ही रहमों कर्म से है
सत्तापति एक ही ,
जो पूरा ब्रह्माण्ड चलारहा है सिर्फ तेरा ही घर नहीं वो तो जीव जंतु
सभी को चला रहा है देता है वो जिसे भी सत्ता ,
मिलती सत्ता उसे उसी के हुकम से
रखना याद इतना ,
है ये सत्ता उसी की तू भी जीता है उसी के रजा से ...
..........
दुरूपयोग होता जब भी सत्ता का
............
गिरता फिर वापस तू उसी के हुकम से
............
संत की तपस्या भंग हो तो वो राजा होजाता है पर जब भी राजा
की तपस्या भंग हो ,
पुनः लोटता नरक , अपने ही कर्म से
भी हिलता है तो उसी के हुकम से अधिकार है हमारा ,
खुद ही के कर्म से मिलता है फल तेरे ही कर्म की नियत से
हज़ारो की किस्मत तेरे हाथ थी
अगर पास कर देता तो क्या बात थी ?
God :
गर्लफ्रेंड थोड़ी कम बनता तो क्या बात थी ?
किताबे तो सारी तेरे पास थी !!
दुनिया मे बेवफाओ की कमी नही
अब सूरज को देख लो आता है उशा के साथ रहता है किरण के
साथ और जाता है संधया के साथ ....
....
बनाने वाले ने भी तुझे ,
किसी कारण से बनाया होगा ,
छोड़ा होगा जब ज़मीन पर तुझे ,
उसके सीने में भी दर्द तो आया होगा ...
सुबह का हर पल ज़िंदगी दे आपको दिन का हर लम्हा खुशी दे
आपको जहा गम की हवा छू कर भी न गुज़रे वो जन्नत से ज़मीन
दे आपको खुदा
कफ़न के साथ ही रिस्ते भी दफ़न हो जाते हैं वक्त के पन्नों पर
कर्मों का लेखा है कभी हम उनके बाप ,
तो कभी वो भी हमारे बाप हो जाते हैं कभी हम हिन्दू तो कभी
हम भी मुसलमान हो जाते हैं

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